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आज पर्दे पर रिलीज हो गई है परिणीति चोपड़ा और सिद्धार्थ मल्होत्रा स्टारर फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’। फिल्म का नाम और ट्रेलर देखकर आप ये तो समझ ही चुके होंगे कि फिल्म की मुद्दे पर आधारित है। दरअसल, ये फिल्म बिहार और उत्तर प्रदेश के पकड़वा विवाह पर बेस्ड है। इसमें होता ये है कि जो परिवारवाले अपनी बेटी की शादी में दहेज देने के काबिल नहीं होते, वो जबरन एक पढ़े-लिखे कुंवारे लड़के का किडनैप करते हैं और उसकी शादी अपनी बेटी से करा देते हैं। फिल्म पकड़वा शादी के अलावा दहेज जैसे गंभीर मुद्दे को पर्दे पर उठाती है, लेकिन क्या इन मुद्दों के साथ दर्शकों का दिल जीत पाएगी जबरिया जोड़ी? आइए जानते हैं
कहानी:
फिल्म की कहानी बिहार पटना के एक बाहुबली अभय सिंह (सिद्धार्थ मल्होत्रा) से शुरु होती है... जोकि 'पकड़वा विवाह' के एक्सपर्ट हैं। अभय पढ़ले-लिखे कुंवारे दूल्हों को किडनैप करके उनकी शादी उन लड़कियों से करवाता है जिनके परिवार वाले मोटा दहेज देने में सक्षम नहीं है। अभय के पिता हुकुम सिंह (जावेद जाफरी) का भी इस काम को अंजाम देने में बड़ा हाथ होता है। उनका मानना है कि दहेज के लोभियों का इस तरह से अपहरण कर के और गरीब परिवार की बेटी से शादी कराना एक पुण्य का काम होता है। यानी वो सब मिलकर एक समाज कल्याण का काम कर रहे हैं। ऐसी ही एक जबरिया शादी में अभय की मुलाकात होती है बबली यादव (परिणीति चोपड़ा) से, जोकि उसका बचपन का प्यार है। बड़े शहर ट्रांसफर होने के बाद वह एक-दूसरे से बिछड़ गये, कई सालों के बाद बबली से मुलाकात अभय के मन में लड्डू फोड़ देती हैं। बबली भी अभय सिंह से कम दबंग नहीं है। प्यार में धोखा देने वाले अपने आशिकों को वह सरेआम नैशनल टीवी पर पीटकर बबली बम बन चुकी है। बबली के पिता दुनियालाल (संजय मिश्रा) सीधे-सादे अध्यापक हैं, तो उसके दोस्तों की टोली में संतो (अपारशक्ति खुराना) जैसा हमदर्द भी है, जो बबली को मन ही मन चाहता है। अभय सिंह और बबली की मुलाकातें बढ़ती हैं और बबली का प्यार फिर जाग उठता है, इस प्यार के बढ़ जाने के बाद अभय की जिंदगी के कई उसूल बदल जाते हैं... वह अब दिमाग के बयाज दिल की बाते सुनने में विश्वास रखता है। कहानी में कई ट्विस्ट एंड टर्न आते हैं, जिसके बाद उसे अहसास होता है कि जितनी गलत दहेज प्रथा है, उतनी ही गलत ये जबरिया शादी भी।
फिल्म का फर्स्ट हाफ, दूसरे हाफ की तुलना में थोड़ा इंटरटेनिंग है। दूसरे हाफ में कहानी बिखरने लगती है। फिल्म के कई हिस्से आपको बेहद ही लाउड और अतार्किक लगेंगे। वहीं, क्लाइमैक्स जरूरत से ज्यादा ही खिंचा हुआ है।
प्रदर्शन:
हंसी तो फंसी में सिद्धार्थ और परिणीति की कैमिस्ट्री काफी ज्यादा पसंद की गई थी, लेकिन इस फिल्म में दोनों का बिहारी अवतार न चाहकर भी थोड़ा अटपटा लगने वाला है। पहनावे से लेकर बिहारी एक्सेंट तक दोनों ने कड़ी मेहनत की है, लेकिन अफोसस की बात है कि दोनों अपने अंदर से शहर इमेज निकाल नहीं पाये हैं। वहीं संजय मिश्रा, जावेद जाफरी, आपरशक्ति खुलराना ने अपने-अपने किरदारों में जान डाली है।
देखे या नहीं-
गंभीर मुद्दे पर उठाकर उसे दिलचस्प बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले आपको उतना इम्प्रेस नहीं कर पाएगा जितना आपने उम्मीद की है।
हम इस फिल्म को देते हैं 5 में से ढाई स्टार
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