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महात्मा गांधी ने चंपारण से ही सत्याग्रह की शुरुआत की थी। बाद में यह चंपारण क्षेत्र दो जिलों पूर्वी चंपाारण और पश्चिमी चंपारण में बंट गया। सुशील पूर्वी चंपारण के जिला मुख्यालय मोतीहारी में रहते हैं। सुशील मोतिहारी के ही नर्सरी से पौधे लेते हैं। डॉ़ श्रीकृष्ण सिंह सेवा मंडल में नर्सरी चलाने वाले कृष्णकांत कहते हैं कि उन्होंने 10 हजार से अधिक चंपा के पौधे इस अवधि में बेचे हैं। कृष्णकांत बताते हैं कि मोतिहारी में तीन नर्सरियां हैं और तीनों से सुशील पौधे खरीदते हैं। उन्होंने बताया के सभी पौधे वे लोग कोलकाता से मंगवाते हैं। सुशील कहते हैं कि पहले यहां 80 रुपये की दर से चंपा के पौधे मिलते थे, लेकिन आज 15 रुपये प्रति पौधे की दर से चंपा के पौधे उपलब्ध हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस अभियान के लिए कोई संस्था या संगठन नहीं बनाया गया है, लेकिन इस अभियान से बड़ी संख्या में महिला और पुरुष, छात्र-छात्राएं जुड़े हुए हैं, जो घर-घर जाकर पौधरोपण कर रहे हैं।
भविष्य की योजना के बारे में पूछे जाने पर सुशील ने कहा, "मेरा यह अभियान चलता रहेगा। चंपारण के बाद यह पूरे राज्य में पहुंचेगा।" उनका कहना है कि किसी एक व्यक्ति के प्रयास से पर्यावरण संतुलन नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके लिए छोटा ही सही, प्रयास तो किया जा ही सकता है। उन्होंने कहा कि आज पीपल और बरगद जैसे पेड़ तेजी से नष्ट हो रहे हैं, क्योंकि ये ज्यादा स्थान घेरते हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं ऐसे पेड़ों को बचाना जरूरी है।
इस अभियान में सुशील का साथ देने वाले और वर्षो से पर्यावरण बचाने में लगे मोतिहारी के व्यवसायी आलोक दत्ता कहते हैं, "हमारा मकसद चंपारण को न केवल पुरानी पहचान दिलवाना है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को यह बताना भी है कि इस क्षेत्र का चंपारण नाम क्यों पड़ा।"उन्होंने कहा कि आज पेड़ को बचाकर ही पर्यावरण को संतुलित किया जा सकता है और मानव जीवन बचाया जा सकता है। आईएएनएस
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