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बिस्मिल्लाह ख़ान रूहानियत का दूसरा नाम है, जो शहनाई के सहारे दिल में उतरकर समा जाती है। बानरस की गलियों. नदियों और आकाश में उनकी रवानी आज भी इस तरह से घुली-मिली है, जो दुनिया के दूर कूचों और गलियों से संवेदनशील आत्माओं को अपनी ओर आकर्षित करती रहती है। हालाँकि एक कालजयी तान... बिस्मिल्लाह ख़ान 21 अगस्त, 2006 को 90 बरस की उम्र में काशी यानी कि बनारस की भूमि पर से विदा लेकर हमें और इस दुनिया को छोड़कर हमेशा के लिए चले गये और मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ख़ान की आज 13वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है।
हुआ कुछ यूँ था कि 17 अगस्त, 2006 को बिस्मिल्लाह ख़ान की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें इलाज के लिए वाराणसी के हेरिटेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। आपको बता दें कि उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की एक ऐसी इच्छा थी मरते दम तक नहीं पूरी हो पायी थी। जी हाँ, बिस्मिल्लाह ख़ान शहीदों को श्रृद्धांजलि देना चाहते थे और इसके लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की अंतिम इच्छा थी कि वह इंडिया गेट पर अपनी शहनाई का प्रदर्शन करें। लेकिन उन्हें जीतेजी यह नसीब नहीं हो सका।
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बिस्मिल्लाह ख़ान के बचपन का पूरा नाम क़मरुद्दीन बिस्मिल्लाह ख़ान था, जो बाद में उस्दाद क़मरुद्दीन बिस्मिल्लाह ख़ान के नाम से दुनियाभर में मशहूर हुये। ये भारतीय उपमहाद्वीप के एक महान संगीतकार थे, जो कि शहनाई बजाते थे। शहनाई को दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने और जन-जन तक पहुँचाने में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की अहम भूमिका है। आपको बता दें कि बिस्मिल्लाह ख़ान एक शिया मुस्लिम थे और सांप्रदायिक सद्भाव के एक बड़े प्रतीक थे।
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बहरहाल, अस्पताल के बेड पर अपने अंतिम समय तक उन्होंने इसका में इंतजार किया लेकिन चार दिनों के बाद 21 अगस्त, 2006 को कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया और बिस्मिल्लाह ख़ान साहब शहीदों को नमन करने की अपनी इच्छा लिये इस दुनिया से चले गये।
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Author: Amit Rajpoot
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