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पूरी दुनिया इस बात पर एकमत है कि हम सभी को प्रेम-पूर्वक रहना चाहिए। ऐसे में पवित्र सोलह संस्कारों में एक चौदहवें विवाह-संस्कार में प्रेम जैसा अति पवित्र शब्द उपसर्ग होकर जब प्रेम-विवाह यानी कि लव-मैरिज का रूप धारण करता है तो जानें क्यों यही दुनिया इस पर हाहाकार करने लगती है। यही कारण है कि हमें लव मैरिज जैसे विषयों पर चर्चा-परिचर्चा करनी पड़ रही है, अन्यथा यह तो हमारी चेतना के सबसे ऊँचे पायदान पर होकर समाज में रचा-बसा होना चाहिए। इस पर चर्चा का कोई प्रायोजन नहीं होना चाहिए।
लेकिन स्याह सच यही है कि लव मैरिज को लोग ग़लत समझते हैं, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा अभिषाप है। इसलिए इस सवाल कि ‘लव मैरिज क्यों और क्यो नहीं’ में ‘नहीं’ को मैं सबसे पहले तो पूरी तरह से खंडित करता हूँ और आगे कहता हूँ कि आख़िर लव मैरिज क्यो?
वास्तव में लव मैरिज को नकारना और इसमें बाधा पहुँचाना ईश्वर को अपमानित करने जैसा है, क्योंकि जब हम पैदा होते हैं तो उसके बाद परिवार के साथ हमारे जो रिश्ते बनते हैं वह ख़ून के रिश्ते होते हैं, लेकिन इससे इतर अब जो अन्य रिश्ते हम बनाते हैं वह सभी ख़ून से नहीं प्रेम से ही बँधे होते हैं। ईश्वर से भी हमारा रिश्ता प्रेमवश ही है।
इसलिए प्रेम को नकारना ईश्वर को नकारने जैसा है। जो ख़ून के रिश्ते हैं वह भी प्रेम-तत्व के बिना रसहीन होकर सूख जाते हैं। ऐसे में जो कुछ है वह प्रेम ही है। फिर हम जिसे अर्धांगिनी बनाकर पूरा जीवन साथ रहने वाले हैं उससे प्रेम-विवाह न करें यह कैसा बेहूदा तर्क है।
हालाँकि परिवार के समर्थन की कमी प्रेम-विवाह में अक्सर होती है। इसलिए चूँकि माता-पिता की भावनात्मक, वित्तीय और भौतिक उपस्थिति का हमारे जीवन में महत्व है। अतः उसे बचाकर कैसे रखा जाये यह भी ध्यान देने योग्य बात है, अन्यथा लव मैरिज नहीं करनी चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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