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दिल्ली में कितने सारे निर्माण कार्य चल रहे होते हैं, जिनमें सैकड़ों मज़दूर काम करते हैं। ये मज़दूर यहाँ अस्थाई रूप से रहते हैं, जो कभी यहाँ तो कभी वहाँ भटकते रहते हैं। इन लोगों को जहाँ पर काम मिलता है, वहाँ ये अपना उस दिन तक आशियाना बनाकर रखते हैं, जब तक वहाँ इनका काम चलता है। इसके बाद ये अपने डेरा कहीं और जाकर डालते हैं। ऐसे में समझने वाली बात है कि इन मज़दूरों के बच्चे पढ़ते कहाँ होंगे। इनका सामाजिक विकास कैसा होता होगा और होता भी होगा तो भला कैसे? बस, इसी सवाल ने अपर्णा लक्ष्मी के जेहन में ऐसी खलबली मचाई कि इन्होंने इस पर काम करने का मन बना लिया।
अपर्णा लक्ष्मी ने सबसे पहले जाकर इन मज़दूरों को समझाया कि यदि उनके बच्चे पढ़ेंगे-लिखेंगे नहीं तो यह कितना घातक है। अच्छी बात ये है कि कुछ मज़दूर अपर्णा की बात आसानी से समझ गये और अपने बच्चों को अपर्णा लक्ष्मी के पास पढ़ने के लिए बेजने लगे। अपर्णा ने इन बच्चों को कॉपी, पेन आदि दिया और फिर इन्हें फ़्री में पढ़ाने लगीं। देखते ही देखते इन बच्चों की संख्या कुल 100 हो गयी। इन बच्चों को पढ़ता देख इनके माता-पिता काफी ख़ुश थे।
पढ़ाई के दौरान अपर्णा लक्ष्मी इन बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ जीवन की कुछ और भी बुनियादी बातें बताती हैं। आगे जाकर इन्होंने किराये की जगह लेकर रेडियंट किड्स मल्टी एक्टिविटी सेंटर खेला। यहाँ इन बच्चों को पढ़ने में सहूलियत मिलने लगी।
आपको बता दें कि इन बच्चों को अपर्णा अंग्रेज़ी, गणित और कम्प्यूटर के अलावा डान्स, म्यूज़िक, आर्ट एंड क्राफ्ट, योग कराटे और दूसरी तरह की गतिविधियाँ भी सिखाती हैं। इस प्रकार, मजदूरों के बच्चों का समावेशी विकास करने के अपर्णा लक्ष्मी के काम से हम सभी को प्रेरणा मिलती है कि हम लोग भी अपने आसपास ऐसा कर सकते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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