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वेदों की बात करें तो इस लिखा है कि पूर्वज देवों समान हैं। इसी के साथ ही इस दुनिया में हमें लाने वाले भी वहीं हैं। बता दें कि दुनिया में रहने वाले लोग अपने पूर्वजों का कर्ज चुकाने आए हैं। इसी वजह से श्राद्ध करके हम उनका ऋण चुका सकते हैं। इसी के साथ ही इस दौरान पूजा अर्तरा करनी होती है। समर्पण और कृतिज्ञता कि इस भावना को अपने पूर्वजों को दिखाने के लिए श्राद्ध किया जाता है।
इस दौरान पूजा अर्चना करने से इंसान का ऋण उतरता है। इसी के साथ ही दान पुन्य करने की आदत भी बड़ जाती है। ‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से निकला है, क्योंकि श्राद्ध का प्रथम चरण ही होता है। अगर आप में श्रद्धा तका भाव नहीं होगा तो आप श्राद्ध नहीं कर सकते हैं। इसी के साथ ही इस दौरान की गयी पूजा अर्चना जिंदगीभर काम आती है। पूजा खासकर पितृपक्ष के पूर्वजों की ही होती है।
क्यों होती है सिर्फ पितृपूजा:
पितृ पक्ष में किए गए कार्यों से पूर्वजों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है तथा कर्ता को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। आत्मा की अमरता का सिद्धांत तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण गीता में उपदेशित करते हैं। आत्मा जब तक अपने परम-आत्मा से संयोग नहीं कर लेती, तब तक विभिन्न योनियों में भटकती रहती है और इस दौरान उसे श्राद्ध कर्म में संतुष्टि मिलती है।
12 तरह से किया जाता है श्राद्ध-
पहला- नित्य श्राद्ध है जो प्रतिदिन किया जाता है। प्रतिदिन की क्रिया को ही 'नित्य' कहते हैं।
दूसरा- नैमित्तिक श्राद्ध है जो एक पितृ के उद्देश्य से किया जाता है, उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं।
तीसरा- काम्य श्राद्ध है जो किसी कामना या सिद्धि की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
चौथा- पार्वण श्राद्ध है जो अमावस्या के विधान के अनुरूप किया जाता है।
पांचवीं- तरह का श्राद्ध वृद्धि श्राद्ध कहलाता है। इसमें वृद्धि की कामना रहती है जैसे संतान प्राप्ति या परिवार में विवाह आदि।
छठा- श्राद्ध सपिंडन कहलाता है। इसमें प्रेत व पितरों के मिलन की इच्छा रहती है। ऐसी भी भावना रहती है कि प्रेत, पितरों की आत्माओं के साथ सहयोग का रुख रखें।
सात से बारहवें प्रकार के श्राद्ध की प्रक्रिया सामान्य श्राद्ध जैसी ही होती है। इसलिए इनकाअलग से नामकरण गोष्ठी, प्रेत श्राद्ध, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ और पुष्टयर्थ किया गया है।
इसी के साथ ही इस साल के श्राद्ध कल यानी 14 सितंबर से श्राद्ध शुरू हो रहें हैं।
Anida Saifi
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