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संजा पर्व मुख्य रूप से कन्याओं का पर्व है, जो अश्विन के महीने के शुरुआत में पूर्णिमाश्राद्ध से शुरू होकर पूरे शुक्ल पक्ष 16 दिनों तक चलता है। कहने का मतलब संजा कुँवारी कन्याओं का पर्व जो भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक मनाया जाता है। वैसे तो यह कुँवारियों का पर्व इसलिए भी माना जाता है क्योंकि विवाह के साथ ही इनका यह पर्व छूट जाता है। सोलह की संख्या वैसे भी कुँवारियों के लिए पूर्णता का प्रतीक होती हैं, इसलिए यह सोलह दिनों तक चलता है।
आपको बता दें कि संजा पर्व यूँ तो यह भारत के कई भागों में मनाया जाता है। लेकिन इसका नाम अलग होता है, जैसे- महाराष्ट्र में गुलाबाई (भूलाबाई), हरियाणा में 'सांझी धूंधा', ब्रज में 'सांझी', राजस्थान में 'सांझाफूली' या 'संजया'। क्वार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक शाम ढलने के साथ घर के दालान की दीवार के कोने को ताजे गोबर से लीपकर पतली-पतली रेखाओं पर ताजे फूल की रंग-बिरंगी पंखुड़ियाँ चिपका कर संजा तैयार की जाती है।
ग़ौरतलब है कि श्राद्ध के ये 16 दिन लड़कियों के हर दिन अलग-अलग दिन अलग-अलग गीतों और संगीत का मधुर उत्सव है। इस दिन ताजी बनी संजा की मूरत को पत्ती और फूलों से सजाया जाता है तथा श्रृंगार किया जाता है। बहरहाल, आपको बता दें कि संजा सिर्फ एक परंपरा नहीं है। संजा के मांडनों तथा गीतों में महिलाओं के विवाहित जीवन से जुड़े कई जीवन सूत्र छिपे होते हैं, जिन्हें बचपन में ही कुंवारी कन्याओं के जीवन में संजा पर्व के दौरान समझने का मौका मिलता है।
हालाँकि बदलते समय के साथ इस परंपरा का ह्रास अवश्य हुआ है, लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में कुंवारी कन्याएँ बहुत ही उत्साह व उमंग के साथ संजा पर्व मनाती हैं।
Author: Amit Rajpoot
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