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इन दिनों कार्कोट राजवंश के सार्वभौम राजा ललितादित्य मुक्तापीड देशभर में चर्चा का विषय हैं। उनकी चर्चा नई दिल्ली स्थित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में हुए एकदिवसीय सेमीनार के बाद होने लगी है। जी हाँ, आपको बता दें कि 8वीं शताब्दी के सार्वभौम राजा या पश्चिमी दृष्टि से कहें तो विश्व विजेता सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड पर भारत के भीतर संभवतः पहली बार ऐसी अकादमिक बहस हुयी है, जिस पर अभी गहरे शोध की दरकार है। मालूम हो कि भारतीय दृष्टि से इतिहास के अध्ययन और लेखन के अवश्यंभावी काल में कार्कोट वंश के इस विराट विजेता पर प्रकाश डालने के लिए 'सभ्यता अध्ययन केन्द्र' और 'जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र' ने संयुक्त प्रयास किये हैं।
ग़ौरतलब है कि गोनंद वंश का अंतिम नरेश बालादित्य पुत्रहीन था। उसने अपनी कन्या का विवाह एक कायस्थ दुर्लभवर्धन से किया जिसने कर्कोट कायस्थ क्षत्रिय वंश की स्थापना लगभग 627 ई. में की। इसी के शासनकाल में प्रसिद्ध चीनी चात्री युवान्च्वांग भारत आया था। उसके 30 वर्ष राज्य करने के पश्चात् उसका पुत्र दुर्लभक गद्दी पर बैठा और उसने 50 वर्ष तक राज्य किया। फिर उसके ज्येष्ठ पुत्र चंद्रापीड ने राज्य का भार सँभाला। इसने चीनी नरेश के पास दूत भेजकर अरब आक्रमण के विरुद्ध सहायता माँगी थी। अरबों का नेता मोहम्मद बिन कासिम इस समय तक कश्मीर पहुँच चुका था।
यद्यपि चीन से सहायता नहीं प्राप्त हो सकी तथापि चंद्रापीड ने कश्मीर को अरबों से आक्रांत होने से बचा लिया। कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार चंद्रापीड की मृत्यु उसके अनुज तारापीड द्वारा प्रेषित कृत्या से हुई थी। चंद्रापीड ने साढ़े साठ वर्ष राज्य किया। तत्पश्चात् तारापीड ने चार वर्ष तक अत्यंत क्रूर एवं नृशंस शासन किया। उसके बाद ललितादित्य मुक्तापीड ने शासनसूत्र अपने हाथ में ले लिया।
Author: Amit Rajpoot
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