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सीताहरण के बाद लंका के राजा रावण ने माँ सीता को अपने सोने के महल में न रखकर पंचवटी में रखा था। क्या आप पंचवटी के बारे में कुछ जानते हैं, सममलन पंचवटी क्या होती है। क्या यह किसी स्थान विशे, का नाम है या रावण के किसी बगीचे का नाम पंचवटी, पंटवटी कोई पौधा होता है या फिर कुछ और...। इन तमाम शंकाओं का समाधान करने के लिए आज हम आपको पंचवटी के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही साथ हम यह भी बताएँगे कि पंचवटी के औषधीय और दार्मिक महत्व क्या होते हैं।
ख़ैर, सबसे पहले आपको फटाक से बता दें कि पीपल, बरगद या वट, बेल, आँवला तथा अशोक ये पाँचो वृक्ष मिलकर पंचवटी कहे गये हैं। इन पाँचों वृक्षों में अद्वितीय औषधीय गुण होते है। इनकी स्थापना पाँच दिशाओं में करनी चाहिए। पीपल पूर्व दिशा में, बेल उत्तर दिशा में, वट पश्चिम दिशा में, आँवला दक्षिण दिशा में और आग्नेय कोण में अशोक की रोपाई करनी चाहिए। मालूम हो कि पाँच वर्षों के पश्चात् पंचवटी में चार हाथ की सुन्दर वेदी की स्थापना बीचोबीच में करनी चाहिए। यह अनन्त फलों को देने वाली व तपस्या का फल प्रदान करने वाली है।
पंचवटी का औषधीय महत्वः
ग़ौरतलब है कि इन पाँचों वृक्षों में अद्वितीय औषधीय गुण होते हैं। आँवला विटामिन-सी का सबसे समृद्ध स्त्रोत है एवं शरीर को रोग प्रतिरोधी बनाने की महा औषधि है। बरगद का दूध बहुत बलदायी होता है। इसके प्रतिदिन प्रयोग से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। पीपल रक्त विकार दूर करने वाला वेदनाशामक एवं शोथहर होता है। बेल पेट सम्बन्धी बीमारियों की अचूक औषधि है तो अशोक स्त्री विकारों को दूर करने वाला औषधीय वृक्ष है।
पंचवटी का धार्मिक महत्वः
बेल पर भगवान शंकर का निवास माना गया है, तो वहीं पीपल पर भगवान विष्णु एवं वट वृक्ष पर ब्रह्मा जी का वास माना जाता है। इस प्रकार प्रमुख त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का पंचवटी में निवास है एवं एक ही स्थल पर तीनों के पूजन का लाभ मिलता है।
Author: Amit Rajpoot
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