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मुंशी प्रेमचंद हिन्दी के मूर्धन्य कवि और विद्वान थे। उनकी एक सुंदर कविता के माध्यम से हर कोई अपना भी दर्द बयाँ कर सकता है और इकी ज़रूरत इसलिए है क्योंकि दर्द सभी के सीने में हैं और उसे साझा करने वाला न तो की माध्यम है और न ही लोगों के पास ऐसा कोई विकल्प ही है जिसके साथ वह अपना ये दुःख साझा कर सकें। लिहाजा आज आज हमें मुंशी प्रेम चंद की लेखनी देखनी पड़ी, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने के बाद आपका किसी से नाराज़ मन सुकून महसूस करने लगेगा।
क़लम के जादूगर!
अच्छा है,
आज आप नहीं हो।
अगर होते,
तो, बहुत दुखी होते।
आप ने तो कहा था
कि, खलनायक तभी मरना चाहिए
जब,
पाठक चीख चीख कर बोले,
मार-मार-मार इस कमीने को।
पर,
आज कल तो,
खलनायक क्या?
नायक-नायिकाओं को भी,
जब चाहे
तब,
मार दिया जाता है।
फिर जिंदा कर दिया जाता है।
और फिर मार दिया जाता है।
और फिर,
जनता से पूछने का नाटक होता है-
कि अब,
इसे मरा रखा जाए?
या जिंदा किया जाए?
सच,
आप की कमी,
सदा खलेगी हर उस इंसान को,
जिसे
मुहब्बत है
साहित्य से,
सपनों से,
स्वप्नद्रष्टाओं,
समाज से,
पर समाज के तथाकथित सुधारकों से नहीं।
हे कलम के सिपाही,
आज के दिन
आपका सब से छोटा बालक,
आप के चरणों में
अपने श्रद्धा सुमन,
सादर समर्पित करता है।
Author: Amit Rajpoot
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