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सुहागनों का सबसे कठिन और बड़ा व्रत माने वाला करवा चौथ इस साल 17 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इस दिन की खास तैयारी के लिए सुहागन महिलाओं ने लंबे समय से तैयारियां शुरू कर दी हैं। वहीं बाजारों में भी एक अलग ही रौनक देखने को मिल रही है। इस खास दिन पर महिलाएं पूरे दिन हार-श्रृंगार कर तैयार होती हैं और शाम को पूजा करती हैं। इसके बाद रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही पति के हाथों से कुछ खाती-पीती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को पति की लंबी और निरोगी आयु के लिए किया जाता है। कई दशकों से महिलाएं इस उपवास को करती आ रही हैं। हालांकि, इसे लेकर एक सवाल यह भी आता है कि आखिर इस अनोखे व्रत की शुरुआत किसने की थी। तो चलिए आज इसी पर एक चर्चा करते हैं।
मान्यता है कि, प्राचीन समय में करवा नाम की एक पतिव्रता महिला हुआ करती थी। वह अपने पति के साथ नदी किनारे एक गांव में रहा करती थी। एक दिन उसका पति स्नान करने के लिए नदी में गया तो, वहां मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और उसे खाने के लिए अपनी ओर खींचने लगा। तभी उसने मदद के लिए अपनी पत्नी का नाम लेते हुए करवा, करवा चिल्लाना शुरू किया। करवा दौड़ती हुई वहां पहुंची तो यह नजारा देखकर चौंक गई। उसने तुरंत अपनी सूती साड़ी से एक धागा निकाला और अपने सतीत्व के प्रताप से मगरमच्छ को उस कच्चे धागे बांध दिया।
इसके बाद वह यमराज के पास पहुंची और पूरी बात बताई। साथ ही उसने कहा कि आप अपनी शक्ति से मगरमच्छ को मृत्युदंड दें। लेकिन इस पर यमराज बोले कि अभी मगरमच्छ की आयु बाकी है वह उसे असमय उसे मृत्यु नहीं दे सकते। यमराज से नाराज करवा ने कहा कि अगर आप मगरमच्छ को मारकर मेरे पति को चिरायु का वरदान नहीं देंगे तो मैं अपने तपोबल से आपको नष्ट होने का शाप दे दूंगी। वहीं खड़े चित्रगुप्त यह सब देख रहे थे। वह करवा की इस बात को सुनकर सोच में पड़ गए। इसके बाद उन्होंने मगरमच्छ को यमराज लोग में भेज दिया और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान दिया।
इसके बाद चित्रगुप्त ने करवा को सुख-समृद्धि से जीवन यापन का आशीर्वाद भी दिया। उन्होंने कहा कि, "जिस तपोबल के साथ आज तुमने अपने पति की रक्षा की है, मैं वरदान देता हूं जो भी महिला इसी तिथि पर पूरी आस्था और विश्वास से पूजा करेगी मैं उसके सौभाग्य की रक्षा करूंगा।" जिस दिन चित्रगुप्त ने यह करवा को यह वरदान दिया उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानी चौथ थी। इसके बाद से ही करवा चौथ का व्रत मनाया जाने लगा। हालांकि इस व्रत को और भी कई कथाएं हैं।
देवी पार्वती ने किया था सबसे पहले यह व्रत
ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले शक्ति स्वरूप माता पार्वती ने भोलेनाथ के लिए रखा था। इसी उपवास को करने के बाद उन्हें अखंड सौभाग्य हासिल हुआ था। कहते हैं कि उन्हीं के बाद से इस व्रत को किया जाने लगा। इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है।
जब सभी देवियों ने किया यह उपवास
एक मान्यता यह भी है कि, एक बार देवाताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। इसमें हर तरह दानव ही देवताओं पर भारी पड़ते हुए दिखाई दे रहे थे। यह सब देख ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों से कहा कि वह अपने पतियों की रक्षा के लिए कार्तिक मास की चतुर्थी के दिन निर्जल रहकर करवा चौथ का व्रत करें। इससे युद्ध में वह विजयी होंगे। देवियों ने ऐसा ही किया और अपने पतियों की सफलता के लिए प्रार्थना की। कहा जाता है कि इसके बाद से ही इस व्रत को करने की प्रथा चली आ रही है।
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