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दिवाली के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीय तिथि को ‘भाई दूज’ का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लम्बी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य की कामना करती हैं। इस दिन भाइयों का तिलक करने और उन्हें भोजन कराने की प्रथा होती है। हालांकि, अलग-अलग जगह भाई-दूज के त्यौहार को अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। कहीं भाई का तिलक करके उसे ‘सूखा नारियल’ दिया जाता है, तो कहीं भाई-बहन सुबह उठकर यमुना में साथ डुबकी लगाते हैं और तिलक कराते हैं।
बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आखिर भाई-दूज का त्यौहार मनाने की प्रथा कब और कैसे शुरू हुई थी...। आइए जानते हैं क्या है इस त्यौहार की पौराणिक कथा-
माना जाता है कि इस दिन यमुना के भाई यमराज लम्बे वक्त बाद अपनी बहन से मिलने उनके घर आये थे। भाई को इतने दिनों बाद देखकर यमुना बेहद खुश हो गई और उन्होंने अपने भाई का खूब सेवा-सत्कार किया। पूजा करके उनका स्वागत किया और खूब स्वादिष्ट भोजन भी खिलाया। बहन के द्वारा की गई इतनी सेवा से यमराज बेहद खुश हो गये और उन्होंने यमुना से मनचाहा वरदान मांगने को कहा। तब यमुना ने वरदान मांगते हुए कहा कि आप यमलोक के स्वामी हो, आप हर शख्स को उसके कर्मों के आधार पर दंड देते हो। मैं आपसे निवेदन करती हूं कि जो मनुष्य मेरे जल में स्नान करके आज के दिन अपनी बहन के हाथों भोजन ग्रहण करेगा उसे मृत्यु के बाद यमलोक न ले जाया जाये।
ये तो रही भाई-दूज की कथा... लेकिन इस त्यौहार को अलग-अलग जगह अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। कुछ जगहों पर भाई-दूज के दिन महिलाएं चार मुंह वाला तेल की दीपक जलाती हैं। अगर शाम के वक्त दीपक जलाने के बाद उन्हें आसमान में चील दिखती हैं, तो इसे बेहद ही शुभ माना जाता है। इसका मतलब होता है कि भाई की आयु बढ़ जाएगी और उसकी मृत्यु जैसा कोई भी संकट नहीं आएगा। गौरतलब है कि मान्यता होती है कि ये चील आपकी मनोकामना यमराज तक पहुंचा देती है।
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