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आज चार दिवसीय छठ महापर्व का दूसरा दिन है, जिसे ‘खरना’ कहा जाता है। कुछ लोग इसे ‘लोहंडा’ के नाम से भी जानते हैं। खरना का अर्थ है ‘शुद्धिकरण’। छठ का व्रत करने वाली महिलाएं व पुरुष नहाय-खाय के दिन तक व्रत रखते हैं और दिन में केवल एक ही वक्त भोजन करते हैं वो भी केवल मीठा, जिसमें किसी प्रकार का नमक न मिला हो।
कहते हैं इस तरह उपवास रखने से अंतिम दिन तक इंसान का तन और मन दोनों ही शुद्ध हो जाता है।
बेहद कठोर है खरना का नियम-
छठ के दूसरे दिन खरना व्रत की परंपरा होती है, इस दिन व्रती खाने की तो दूर की बात पानी की एक बूंद तक नहीं ले सकते। दिन ढलने पर सूर्यास्त के बाद चावल और गुड़ की खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है। हालांकि, इस दिन का एक बहुत ही कठोर नियम है... वो ये नियम है कि प्रसाद ग्रहण करते वक्त व्रती किसी तरह की आवाज न सुने। वह एकदम एकांत में अपना प्रसाद ग्रहण करें।
जी हां, ये नियम इतना कठोर है कि अगर प्रसाद ग्रहण करते वक्त व्रती ने यदि किसी भी तरह की आवाज सुन ली तो उसे खाना वहीं छोड़ना पड़ता है वो उसके बाद उसे ग्रहण नहीं करेगा।
इस वजह से विशेष ध्यान रखा जाता है कि प्रसाद ग्रहण करते वक्त व्रती के आस-पास किसी प्रकार का कोई शोर-शराबा न हो। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य घर से बाहर चले जाते हैं ताकि किसी प्रकार के शोर की आवाज उनके कानों में न पड़े।
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