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शिक्षा तो उनसे भी मिलती है जो जीवन में कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसे जिंदगी के हर मोड़ पर याद किया जाता है। तो क्या ऐसे लोगों को शिक्षक ना कहें। हरियाणा के सोनीपत में एक ऐसा स्कूल है जहां आज स्टूडेंट्स सिर्फ इसलिए पढ़ पा रहे है क्योंकि गांव के लोगों ने कदम उठाया है स्कूल को बचाने का, स्कूल को चलाने का। स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स के साथ साथ शिक्षा उन लोगों ने भी दिया है जिन्होंने स्कूल का चलाने का बीड़ा उठाया है।
बदहाल स्कूल की बदली तस्वीर
देश मे सरकारी स्कूलों के हालात बहुत अच्छे नहीं है। जहां सरकारी स्कूलों में टीचर्स की कमी है वहीं स्कूलों की इमारतें भी जर्जर हालत में मिलती है लेकिन सोनीपत के बसौदी गांव के लोगों ने अपने प्राइमरी स्कूल को बचाने के लिए खुद के पैसों से स्कूल की इमारत बनवायी और सरकारी स्कूल में टीचर्स की कमी को पूरा करने के लिए 9 प्राइवेट टीचर भी स्कूल में लगा दिए। बसौदी गांव के लोगों की यह मेहनत अब रंग ले आयी है साल 2010 में बसौदी गांव के स्कूल में केवल 28 छात्र थे जिनकी संख्या बढ़कर 300 का आंकड़ा पार कर चुकी है।
छात्रों के भविष्य के लिए ग्रामीणों की मेहनत
कुछ साल पहले सोनीपत के बसौदी गांव के प्राइमरी स्कूल की हालत बेहद खस्ता थी यहां केवल 28 छात्र ही पढने आते थे और यहां के हैडमास्टर ने स्कूल बंद करने की बात कही। उस समय इस गांव के लोगों ने स्कूल को बचाने के लिए एक समिति का गठन किया और खुद के पैसों से स्कूल में चार नये कमरें बनवाये और सरकारी स्कूल में छात्रों को पढाने के लिए 9 प्राइवेट टीचर्स को रख लिये।
अब इस स्कूल में छात्रों की संख्या 300 का आकडा पार कर चुकी है।स्कूल बच्चों को स्कूल में लाने और ले जाने के लिए दो बस भी खरीद रखी है। वहीं स्कूल में लगे प्राइवेट टीचर्स और ड्राइवरों की सैलरी के लिए गांव के छात्रों से साल में महज 2500 और बाहरी गांव से आने वाले छात्र-छात्राओं से 5000 रूपए सालाना फीस ली जाती है।
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