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दशहरे के दिन यूँ तो बहुत सारे विधि विधान हम सब करते हैं। इस दिन बड़ों से आशीर्वाद लेना, अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करना, रावण के पुलतों का दहन करना, माँ दुर्गा का विसर्जन और बहुत सारे विधान इसमें शामिल हैं। लेकिन इसमें सबसे ख़ास है पान का बीड़ा खाना। जी हाँ, पान खाने का बीड़ा खाने का दशहरे में बड़ा चलन है। इस दिन हर हिन्दू परिवारों में पान की अद्बुत थाल सजाकर रखी जाती है। इसमें पान से साथ गरी, लौंग और इलायची को विशेष रूप से तरजीह देकर आगे रखा जाता है, क्योंकि ये पान के मुख्य अवयवों में से एक हैं। इस तरह दशहरे के दिन घर पर आने वाले हर एक को पान का बीड़ा दिया जाता है। आइए जानते हैं कि आख़िर दशहरे के दिन इस तरह की परंपरा के पीछे क्या लॉजिक छुपा हुआ है।
दरअसल, दशहरे के दिन पान का बीड़ा सबसे पहले हनुमान जी को चढ़ाया जाता है। इसके बाद इसे सब लोगों में बाँटा जाता है। आपको बता दें कि दशहरे के दिन परिवार में सभी पान खाते हैं, फिर वो चाहे बच्चे हों, महिलाएँ हों या वो लोग हों जो पान नहीं खाते या खाना पसंद नहीं करते हैं।
दशहरे के दिन पान खाने का लॉजिक है कि पान को जीत का प्रतीक माना गया है। पान का 'बीड़ा' शब्द का एक महत्व यह भी है इस दिन हम सही रास्ते पर चलने का बीड़ा यानी कि सौगंध उठाते हैं। दशहरे में रावण दहन के बाद पान का बीड़ा खाने की परम्परा है।
इसके अलावा भी जानकारों की मानें तो पान का पत्ता मान और सम्मान का प्रतीक है। इसलिए हर शुभ कार्य में इसका उपयोग किया जाता है। नवरात्रि पूजन के दौरान भी माँ दुर्गा को पान-सुपारी चढ़ाने का विधान होता है। इसके अलावा पान के पत्ते का उपयोग विवाह से लेकर कथा-पाठ तक हर शुभ अवसर पर उपयोग में लिया जाता है। पान कई तरह की बीमारियों और संक्रमण से भी रक्षा करता है।
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